
भारतीय समाज में जातियो के उदभव की और दृष्टि डाले तो हमे ग्यात होता है कि अपने उदभवकाल में जातियाँ सामाजिक और प्रशिक्षण कर्ता हुआ करते थे। उनका गठन कर्म के आधार पर हुआ था। कुछ जातियाँ अपने तकनीकी ग्यान एक पिडी से दुसरी पिडी को हस्तांतरित करता रहता था, कुम्हार, सुनार,नाई, खाती, कुमावत पुर्व में (सलावट, संतरास, गजधर, मिस्त्री, राजमिस्त्री, चेजारा, वास्तुकार, कारीगर) ये वो जातियाँ है रही हैं। जो कार्यों का वंशानुगत हस्तांतरित का ही विकसित रूप है। इन जातियों रो दस्तकार जातियाँ कहा गया,कुछ अपने ग्यान के कुछ पराक्रम के बल पर बनी,पर आज सभी जातियों का आधार जन्मजात हो गया है।
कुमावत जाति का वर्तमान स्वरूप हजारो वर्षों के सामाजिक परिवर्तन एवं परिस्थिति,जन अस्तित्व निर्माण शैली,वास्तु के सृजन का परिष्कृत रूप हैं। जिस प्रकार अन्य जातियाँ अपने कर्म के अनुसार जानी गई है।
कुमावत जाति भी अपने कर्म के आधार पर जानी गई है। देशकाल एवं स्थानीय अलग अलग परिस्थितियों के कारण इस जाति को अलग अलग नामो से जाना जाता रहा है। जेसे उस्ता, राजकुमार, राजमिस्त्री, चैजारा, गवडी, परदेशी, नाईक, बैलदार, राज शिल्पि राजकुमावत, पर इन सबका कर्म भवन निर्माण व खेती बाड़ी रहा है।
कुमावत जाति के लौग आदिकालीन समय से ही स्थापत्य कला सृजन के काम के लिए जानी जाती रही हैं। प्रमाणो के अनुसार सूर्यवंशी श्री राम के वंशज राजा कुरम के वंशज मानते हैं। क्षत्रिय राजवंश में राजा एक को बनाया जाता था। शेष राजकुमार राजा के अधीन काम करने में हीनता समझते थे।
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| 24 | Kashyapa (काश्यप) | History of Kashyapa | |
| 25 | Kaushal (कौशल) | History of Kaushal | |
| 26 | Kaplansh (कप्लंश) | History of Kaplansh | |
| 27 | Kaundinya (कौनदिन्या) | History of Kaundinya | |
| 28 | Kutsa (कुत्सा) | History of Kutsa | |
| 29 | Manu (मनु) | History of Manu | |
| 30 | Mouthkalya (मुखकल्या) | History of Mouthkalya | |
| 31 | Sabarniya (साबरनिया) | History of Sabarniya | |
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| 41 | Siwal (सिवाल) | History of Siwal | |
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